श्रीमद्भागवत महापुराण एकादश स्कन्ध अध्याय 25 श्लोक 16-29

अद्‌भुत भारत की खोज
नेविगेशन पर जाएँ खोज पर जाएँ

एकादश स्कन्ध : पञ्चविंशोऽध्यायः (25)

श्रीमद्भागवत महापुराण: एकादश स्कन्ध: पञ्चविंशोऽध्यायः श्लोक 16-29 का हिन्दी अनुवाद


जब चित्त प्रसन्न हो, इन्द्रियाँ शान्त हों, देह निर्भय हो और मन में आसक्ति न हो, तब सत्वगुण की वृद्धि समझनी चाहिये। सत्वगुण मेरी प्राप्ति का साधन है । जब काम करते-करते जीव की बुद्धि चंचल, ज्ञानेद्रियाँ असन्तुष्ट, कर्मेंदियाँ विकारयुक्त, मन भ्रान्त और शरीर अस्वस्थ हो जाय, तब समझना चाहिये कि रजोगुण जोर पकड़ रहा है । जब चित्त ज्ञानेद्रियों के द्वारा शब्दादि विषयों को ठीक-ठीक समझने में असमर्थ हो जाय और खिन्न होकर लीन होने लगे, मन सूना-सा हो जाय तथा अज्ञान और विषाद की वृद्धि हो, तब समझना चाहिये कि तमोगुण वृद्धि पर है । उद्धवजी! सत्वगुण के बढ़ने पर देवताओं का, रजोगुण के बढ़ने पर असुरों का और तमोगुण के बढ़ने पर राक्षसों का बल बढ़ जाता है। (वृत्तियों में भी क्रमशः सात्वादि गुणों की अधिकता होने पर देवत्व, असुरत्व और राक्षसत्व-प्रधान निवृत्ति,, प्रवृत्ति अथवा मोह की प्रधानता हो जाती है) । सत्वगुण से जाग्रत्-अवस्था, रजोगुण से स्वप्नावस्था होती है। तुरीय इन तीनों में एक-सा व्याप्त रहता है। वही शुद्ध और एकरस आत्मा है । वेदों के अभ्यास में तत्पर ब्राम्हण सत्वगुण के द्वारा उत्तरोत्तर ऊपर के लोकों में जाते हैं। तमोगुण से जीवों को वृक्षादिपर्यन्त अधोगति प्राप्त होती है और रजोगुण से मनुष्य-शरीर मिलता है । जिसकी मृत्यु सत्वगुणों की वृद्धि के समय होती है, उसे स्वर्ग की प्राप्ति होती है; जिसकी रजोगुण की वृद्धि के समय होती है, उसे मनुष्य-लोक मिलता है और जो तमोगुण की वृद्धि के समय मरता है, उसे नरक की प्राप्ति होती है। परन्तु जो पुरुष त्रिगुणातीत—जीवन्मुक्त हो गये हैं, उन्हें मेरी ही प्राप्ति होती है । जब अपने धर्म का आचरण मुझे समर्पित करके अथवा निष्काम भाव से किया जाता है तब वह सात्विक होता है। जिस कर्म के अनुष्ठान में किसी फल की कामना रहती है, वह राजसिक होता है और जिस कर्म में किसी को सताने अथवा दिखाने आदि का भाव रहता है, वह तामसिक होता है । शुद्ध आत्मा का ज्ञान सात्विक है। उसको कर्ता-भोक्ता समझना राजस ज्ञान है और उसे शरीर समझना तो सर्वथा तामसिक है। इन तीनों से विलक्षण मेरे स्वरुप का वास्तविक ज्ञान निर्गुण ज्ञान है । वन में रहना सात्विक निवास है, गाँव में रहना राजस है और जुआघर में रहना तामसिक है। इन सबसे बढ़कर मेरे मन्दिर में रहना निर्गुण निवास है ।अनासक्त भाव से कर करने वाला सात्विक है, रागान्ध होकर कर्म करने वाला राजसिक है और पूर्वापर विचार से रहित होकर करने वाला तामसिक हैं। इनके अतिरिक्त जो पुरुष केवल मेरी शरण में रहकर बिना अहंकार के कर्म करता है, वह निर्गुण कर्ता है । आत्मज्ञानविषयक श्रद्धा सात्विक श्रद्धा है, कर्मविषयक श्रद्धा राजस है और जो श्रद्धा अधर्म में होती है, वह तामस है तथा मेरी सेवा में जो श्रद्धा है, वह निर्गुण श्रद्धा है । आरोग्यदायक, पवित्र और अनायास प्राप्त भोजन सात्विक है। रसनेन्द्रिय को रुचिकर और स्वाद की दृष्टि से युक्त आहार राजस है तथा दुःखदायी और अपवित्र आहार तामस है । अन्तर्मुखता से—आत्मचिन्तन से प्राप्त होने वाला सुख सात्विक है। बहिर्मुखता से—विषयों से प्राप्त होने वाला राजस है तथा अज्ञान और दीनता से प्राप्त होने वाला सुख तामस है और जो सुख मुझसे मिलता है, वह तो गुणातीत और अप्राकृत है ।


« पीछे आगे »

टीका टिप्पणी और संदर्भ

संबंधित लेख

-