महाभारत शान्ति पर्व अध्याय 165 श्लोक 45-61

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पञ्चषष्‍टयधिकशततम (165) अध्याय: शान्ति पर्व (आपद्धर्म पर्व)

महाभारत: शान्ति पर्व: पञ्चषष्‍टयधिकशततम अध्याय: श्लोक 45-61 का हिन्दी अनुवाद

अत: न ब्राह्मण को गाली दे और न उसे कभी धरती पर गिरवे। राजन्! ब्राह्मण के शरीर में घाव हो जाने पर उससे निकला हुआ रक्त धूल के जितने कणों को भिगोता है, उसे चोट पहुंचाने वाला मनुष्‍य उतने ही वर्षों तक नरक में पडा़ रहता है। गर्भ के बच्चे की हत्या करने वाला यदि युद्ध में शस्त्रों के आघात से मर जाय तो उसकी शुद्धि हो जाती है अथवा प्रज्वलित अग्नि में कूदकर अपने आपको होम दे तो वह शुद्ध हो जाता है। मदिरा पीने वाला पुरूष यदि मदिरा को खूब गर्म करके पी ले तो पाप से छुटकारा पा जाता है, अथवा उससे शरीर जल जाने के कारण उसकी मृत्यु हो जाय तो वह शुद्ध हो जाता है। इस प्रकार शुद्ध हो जाने पर ही वह ब्राह्मण शुद्ध लोकों को प्राप्‍त कर सकता है, अन्यथा नहीं। पाप पुर्ण विचार रखने वाला दुरात्मा पुरूष यदि गुरू पत्नी-प्रतिमा का पाप कर बैठे तो वह लोहे की गरम की हुई नारी–प्रतिमा का आलिग्‍ङन करके प्राण दे देने पर ही उस पाप से शुद्ध होता है। अथवा अपने शिश्‍न और अण्‍डकोष को स्वयं ही काटकर अञ्जलि में लेकर सीधे नैर्ॠत्य–दिशा की ओर जाता हुआ गिर पडे़ या ब्राह्मण के लिये प्राणों का परित्याग कर दे तो शुद्ध हो जाता है। अथवा अश्‍वमेधयज्ञ, गोसव नामक यज्ञ या अग्निष्‍टोम यज्ञ के द्वारा भलीभांति यजन करके वह इहलोक तथा परलोक में पूजित होता है। ब्रह्महत्‍या करने वाला मनुष्‍य उस मरे हुए ब्राह्मण की खोपडी़ लेकर अपना पापकर्म लेागों को सुनाता रहे और बारह वर्षों तक ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए सबेरे, शाम और दोपहर तीनों समय स्नान करे। इस प्रकार वह तपस्या में संलग्‍न रहे। इससे उसकी शुद्धि हो जाती है। इसी तरह जो जान–बूझकर गर्भिणी स्त्री की हत्या करता है; उसे उस गर्भिणी–वध के कारण दो ब्रह्महत्याओं का पाप लगता है। मदिरा पीने वाला मनुष्‍य मिताहारी और ब्रह्मचारी होकर पृथ्‍वी पर शयन करे। इस तरह तीन वर्षोंतक रहने के बाद ‘अग्निष्‍टोम’ यज्ञ करे। तत्पश्‍चात् एक हजार बैल या इतनी ही गौएं ब्राह्माणों को दान दे तो वह शुद्ध हो जाता है। यदि वैश्‍व की हत्या कर दे तो दो वर्षों तक पूर्वोक्‍त नियम से रहने के बाद एक सौ बैल और एक सौ गौओं का दान करे, तथा शूद्र की हत्या कर देने पर हत्यारे को एक वर्ष तक पूर्वोक्‍त नियम से रहकर एक बैल और सौ गौओं का दान करना चाहिये। कुत्‍ते, सुअर और गदहों की हत्‍या करके मनुष्‍य शूद्रवध–सम्बन्धी व्रत का ही आचरण करे। राजन्! बिल्ली, नीलकण्‍ठ, मेढक, कौआ, सांप और चूहा आदि प्राणियों को मारने से भी उक्‍त पशु वध के ही समान पाप बताया गया है। अब दूसरे प्रायश्चित्‍तों का भी क्रमश: वर्णन करता हूं। अनजान में कीड़ों–मकोड़ों का वध आदि छोटा पाप हो जाय तो उसके लिये पश्‍चाताप करे। इतने ही से उसकी शुद्धि हो जाती है। गोवध के सिवा अन्य जितने उपपातक हैं उनमें से प्रत्येक के लिये एक–एक वर्षतक व्रत का आचरण करे। श्रोत्रिय की पत्नी से व्यभिचार करने पर तीन वर्ष तक और अन्य परस्त्रियों से समागम करने पर दो वर्षों तक ब्रहमचर्यव्रत का पालन करते हुए दिन के चौथे पहर में एक बार भोजन करे। अपने लिये पृथक् स्थान और आसन की व्यवस्था रखते हुए घूमता रहे। दिन में तीन बार जल से स्नान करे। ऐसा करने से ही वह अपने उपर्यूक्त पापों का निवारण कर सकता है। जो अग्नि को भ्रष्‍ट करता है, उसके लिये भी यही प्रायश्चित है।


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

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