महाभारत शल्य पर्व अध्याय 29 श्लोक 56-76

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एकोनत्रिंश (29) अध्याय: शल्य पर्व (ह्रदप्रवेश पर्व)

महाभारत: शल्य पर्व: एकोनत्रिंश अध्याय: श्लोक 56-76 का हिन्दी अनुवाद

उनके नाम इस प्रकार हैं-शरद्वान् के पुत्र वीर कृपाचार्य, रथियों में श्रेष्ठ द्रोणकुमार अश्वत्थामा तथा भोजवंशी कृतवर्मा। ये सब लोग एक साथ थे और बाणों से क्षत-विक्षत हो रहे थे । मुझे देखते ही उन तीनों ने शीघ्रतापूर्वक अपने घोड़े बढ़ाये और निकट आकर मुझसे कहा-‘संजय ! सौभाग्य की बात है कि तुम जीवित हो’। फिर उन सबने आपके पुत्र राजा दुर्योधन का समाचार पूछा-‘संजय ! क्या हमारे राजा दुर्योधन जीवित हैं ? ’। तब मैंने उन लोगो से दुर्योधन का कुशल समाचार बताया तथा दुर्योधन ने मुझे जो संदेश दिया था, वह भी सब उनसे कह सुनाया और जिस सरोवर में वह घुसा था, उसका भी पता बता दिया । राजन् ! मेरी बात सुन कर अश्वत्थामा ने उस विशाल सरोवर की ओर देखा और करुण विलाप करते हुए कहा-‘अहो ! धिक्कार है, राजा दुर्योधन नहीं जानते हैं कि हम सब जीवित हैं। उनके साथ रह कर हम लोग शत्रुओं से जूझने के लिये पर्याप्त हैं’ । तत्पश्चात् वे महारथी दीर्घकाल तक वहां विलाप करते रहे। फिर रणभूमि में पाण्डवों को आते देख वे रथियों में श्रेष्ठ तीनों वीर वहां से भाग निकले । मरने से बचे हुए वे तीनों रथी मुझे भी कृपाचार्य के सुसज्जित रथ पर बिठा कर छावनी तक ले आये। सूर्य अस्ताचल पर जा चुके थे। वहां छावनी के पहरेदार भय से घबराये हुए थे। आपके पुत्रों के विनाश का समाचार सुन कर वे सभी फूट-फूट कर रोने लगे । महाराज ! तदनन्तर स्त्रिोयों की रक्षा में नियुक्त हुए वृद्ध पुरुषों ने राजकुल की महिलाओं को साथ लेकर नगर की ओर प्रस्थान करने की तैयारी की । उस समय वहां अपने पतियों को पुकारती और रोती बिलखती हुई राजमहिलाओं का महान् आर्तनाद सब ओर गूंज उठा। राजन् ! अपनी सेना और पतियों के संहार का समाचार सुन कर वे राजकुल की युवतियां अपने आर्तनाद से भूतल को प्रतिध्वनित करती हुई बारंबार कुररी की भांति विलाप करने लगीं । वे जहां-तहां हाहाकार करती हुई अपने ऊपर नखों से आघात करने, हाथों से सिर और छाती पीटने तथा केश नोचने लगीं। प्रजानाथ ! शोक में डूब कर पति को पुकारती हुई वे रानियां करुण स्वर से क्रन्दन करने लगीं । इससे दुर्योधन के मन्त्रियों का गला भर आया और वे अत्यन्त व्याकुल हो राजमहिलाओं को साथ ले नगर की ओर चल दिये । प्रजानाथ ! उनके साथ हाथों में बेंत की छड़ी लिये द्वारपाल भी चल रहे थे। रानियों की रक्षा में नियुक्त हुए सेवक शुभ्र एवं बहुमूल्य बिछौने लेकर शीघ्रतापूर्वक नगर की ओर चलने लगे । अन्य बहुत से राजकीय पुरुष खच्चरियों से जुते हुए रथों पर आरूढ़ हो अपनी-अपनी रक्षा में स्थित स्त्रियों को लेकर नगर की ओर यात्रा करने लगे । महाराज ! जिन राजमहिलाओं को महलों में रहते समय पहले सूर्यदेव ने भी नहीं देखा होगा, उन्हें ही नगर की ओर जाते हुए साधारण लोग भी देख रहे थे । भरतश्रेष्ठ ! जिनके स्वजन और बान्धव मारे गये थे, वे सुकुमारी स्त्रियां तीव्र गति से नगर की ओर जा रही थीं । उस समय भीमसेन के भय से पीडि़त हो सभी मनुष्य गायों और भेड़ों के चरवाहे तक घबरा कर नगर की ओर भाग रहे थे ।


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

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