महाभारत शल्य पर्व अध्याय 29 श्लोक 20-42

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एकोनत्रिंश (29) अध्याय: शल्य पर्व (ह्रदप्रवेश पर्व)

महाभारत: शल्य पर्व: एकोनत्रिंश अध्याय: श्लोक 20-42 का हिन्दी अनुवाद

धृतराष्ट्र ने पूछा-सूत ! जब मेरी सेना मार डाली गयी और सारी छावनी सूनी कर दी गयी, उस समय पाण्डवों की सेना में कितने सैनिक शेष रह गये थे ? संजय ! मैं यह बात पूछ रहा हूं, तुम मुझे बताओ; क्योंकि यह सब बताने में तुम कुशल हो। अपनी सेना का संहार हुआ देख कर अकेले बचे हुए मेरे मूर्ख पुत्र राजा दुर्योधन ने क्या किया ?। संजय ने कहा-राजन् ! पाण्डवों की विशाल सेना में से केवल दो हजार रथ, सात सौ हाथी, पांच हजार घोड़े और दस हजार पैदल बच गये थे । इन सबको साथ लेकर सेनापति धृष्ट्रद्युम्न युद्धभूमि में खड़े थे। उधर राजा दुर्योधन अकेला हो गया था । महाराज ! रथियों में श्रेष्ठ दुर्योधन ने जब समरभूमि में अपने किसी सहायक को न देखकर शत्रुओं को गर्जते देखा और अपनी सेना के विनाश पर दृष्टिपात किया, तब वह अकेला भूपाल अपने मरे हुए घोड़े को वहीं छोड़ कर भय के मारे पूर्व दिशा की ओर भाग चला । जो किसी समय ग्यारह अक्षौहिणी सेना का सेनापति था, वही आपका तेजस्वी पुत्र दुर्योधन अब गदा लेकर पैदल ही सरोवर की ओर भागा जा रहा था । अपने पैरों से ही थोड़ी ही दूर जाने के पश्चात् राजा दुर्योधन को धर्मशील बुद्धिमान विदुरजी की कही हुई बातें याद आने लगीं । वह मन ही मन सोचने लगा कि हमारा और इन क्षत्रियों का जो महान् संहार हुआ है, इसे महाज्ञानी विदुरजी ने अवश्य पहले ही देख और समझ लिया था । राजन् ! अपनी सेना का संहार देख कर इस प्रकार चिन्ता करते हुए राजा दुर्योधन का हृदय दुःख और शोक से संतप्त हो उठा था। उसने सरोवर में प्रवेश करने का विचार किया । महाराज ! धृष्टद्युम्न आदि पाण्डवों ने अत्यन्त कुपित होकर आपकी सेना पर धावा किया था तथा शक्ति, ऋष्टि और प्रास हाथ में लेकर गर्जना करने वाले आपके योद्धाओं का सारा संकल्प अर्जुन ने अपने गाण्डीव धनुष से व्यर्थ कर दिया था ।। अपने पैने बाणों से बन्धुओं और मन्त्रियों सहित उन योद्धाओं का संहार करके श्वेत घोड़ों वाले रथ पर स्थित हुए अर्जुन की बड़ी शोभा हो रही थी । घोड़े, रथ और हाथियों सहित सुबल पुत्र के मारे जाने पर आपकी सेना कटे हुए विशाल वन के समान प्रतीत होती थी ।। राजन् ! दुर्योधन की कई लाख सेना में से द्रोणपुत्र वीर अश्वत्थामा, कृतवर्मा, गौतमवंशी कृपाचार्य तथा आपके पुत्र राजा दुर्योधन के अतिरिक्त दूसरा कोई महारथी जीवित नहीं दिखायी देता था । उस समय मुझे कैद में पड़ा हुआ देखकर हंसते हुए धृष्टद्युम्न ने सात्यकि से कहा-‘इसको कैद करके क्या करना है ? इसके जीवित रहने से अपना कोई लाभ नहीं है । धृष्टद्युम्न की बात सुन कर शिनि पौत्र महारथी सात्यकि तीखी तलवार उठा कर उसी क्षण मुझे मार डालने के लिये उद्यत हो गये । उस समय महाज्ञानी श्रीकृष्ण द्वैपायन व्यासजी सहसा आकर बोले-‘संजय को जीवित छोड़ दो। यह किसी प्रकार वध के योग्य नहीं है’ । हाथ जोड़े हुए शिनि पौत्र सात्यकि ने व्यासजी की वह बात सुन कर मुझे कैद के मुक्त करके कहा-‘संजय ! तुम्हारा कल्याण हो। जाओ, अपना अभीष्ट साधन करो’ । उनके इस प्रकार आज्ञा देने पर मैंने कवच उतार दिया और अस्त्र-शस्त्रों से रहित हो सायंकाल के समय नगर की ओर प्रस्थित हुआ। उस समय मेरा सारा शरीर रक्त से भीगा हुआ था । राजन् ! एक कोस आने पर मैंने भागे हुए दुर्योधन को गदा हाथ में लिये अकेला खड़ा देखा। उसके शरीर पर बहुत से घाव हो गये थे ।


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

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