महाभारत वन पर्व अध्याय 135 श्लोक 37-51

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पंचत्रिंशदधिकशततम (135) अध्‍याय: वन पर्व (तीर्थयात्रापर्व )

महाभारत: वन पर्व: पंचत्रिंशदधिकशततम अध्‍याय: श्लोक 37-51 का हिन्दी अनुवाद

यवक्रीत बोले- तपोधन ! यहां अगाध जलराशि भरी है अत: तुम पुल बांधने मे सफल नही हो सकोगे। इसलिये इस असम्भव कार्य से मुहं मोड़ लो और ऐसे कार्य में हाथ डालो, जो तुमसे हो सके । इन्द्र बोले- मुने ! जैसे आपने बिना पढ़े वेदो का ज्ञान प्राप्त करने के लिये यह तपस्या प्रारम्भ की है, जिसकी सफलता असम्भव है, उसी प्रकार मैंने भी यह पुल बांधने का भार उठाया है । यवक्रीत बोले- देवेश्वर पाकशासन ! जैसे आपका वह पुल बांधने को आयोजन व्यर्थ है, उसी प्रकार यदि मेरी इस तपस्या को भी आप निरर्थक मानते है तो वही कार्य कीजिये जो सम्भव हो, मुझे ऐसे उत्तम वर प्रदान कीजिये, जिनके द्वारा मैं दूसरों से बढ़ चढ़कर प्रतिष्‍ठा प्राप्त कर सकूं । लोमशजी कहते है- राजन ! तब इन्द्र महातपस्वी यवक्रीत कथनानुसार उन्हे वर देते हुए कहा—‘यवक्रीत ! तुम्हारे पिता सहित तुम्हें वेदों का यथेष्‍ट ज्ञान प्राप्त हो जायगा। साथ ही और जो भी तुम्हारी कामना हो, वह पूर्ण हो जायगी। अब तुम तपस्या छोड़कर अपने आश्रम को लौट जाओ ।‘ इस प्रकार पूर्णकाम होकर, यवक्रीत अपने पिता के पास गये और इस प्रकार बाले । यवक्रीत बोल- पिताजी ! आपको और मुझे दोनों को ही सम्पूर्ण वेदों को ज्ञान हो जायगा । साथ ही हम दोनों दूसरो से उंची स्थित में हो जायेगे- ऐसा वर मैंने प्राप्त किया है । भरद्वाज बोले- तात ! इस तरह मनोवांच्छित वर प्राप्त करने के कारण तुम्हारे मन में अहंकार उत्पन्न् हो जायगा और अहंकार युक्त होने पर तुम कृपण होकर शीघ्र ही नष्‍ट हो जाओगें । इस विषय में विज्ञजन देवताओं की कही हुई वह गाथा सुनाया करते है- प्राचीनकाल मे बालधि नाम से प्रसिद्ध एक शक्ति शाली मुनि थे । उन्होंने पुत्र शोक से संतप्त होकर कठोर अत्यन्त कठोर तपस्या की । तपस्या का उद्देश्य यह था कि मुझे देवोपम पुत्र प्राप्त् हो । अपनी उस अभिलाषा के अनुसार बालधि को एक पुत्र प्राप्त हुआ । देवताओं ने उन पर कृपा अवश्य की, परंतु उनके पुत्र को देवतुल्य नहीं बनाया और वरदान देते हुए यह कहा ‘ कि मरण धर्मा मनुष्‍य कभी देवता के समान अमर नहीं हो सकता। अत: उसकी आयु निमित ( कारण) के अधीन होगी ‘ । बालधि‍ बोले- देववरो ! जैसे ये पर्वत सदा अक्षय भाव से खड़े रहते हैं, वैसे ही मेरा पुत्र भी सदा अक्षय बना रहे। ये पर्वत ही उसकी आयु के नि‍मि‍त्‍त होगे। अर्थात जब-तक ये पर्वत यहां बने रहे तब तक मेरा पुत्र भी जीवि‍त रहे । भरद्वाज कहते है- यवक्रीत ! तदनन्तर बालधि के पुत्र जन्म हुआ, जो मेधायुक्त होने के कारण मेधावी नाम से विख्यात था। वह स्वभाव का बड़ा क्रोधी था। अपी आयु के विशय में देवताओं के वरदान की बात सुनकर मेधावी घमण्ड में भर गया और ऋषि‍यों का अपमान करने लगा । इतना ही नही, वह ऋषि‍-मुनियों को सताने के उद्देश्य से ही इस पृथ्वी पर सब ओर विचरा करता था। एक दिन मेधावी महान शक्तिशाली एवं मनीषी अनुपाक्ष के पास जा पहूंचा । और उनका तिरस्कार करने लगा। तब तपोबल सम्पन्न ऋषि‍ धनुषाक्ष ने उसे शाप देते हुए कहा- ‘अरे तू जलकर भस्म हो जा।‘ परंतु उनके कहने पर भी वह भस्म नहीं हुआ ।



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टीका टिप्पणी और संदर्भ

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