महाभारत आदि पर्व अध्याय 220 श्लोक 36-55

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विंशत्यधिकद्विशततम (220) अध्‍याय: आदि पर्व (हरणाहरण पर्व)

महाभारत: आदि पर्व: विंशत्यधिकद्विशततम अध्‍याय: श्लोक 36-55 का हिन्दी अनुवाद

नगर की सड़कें झाड़-बुहारकर साफ की गयीं थी। उनके ऊपर जल का छिड़काव किया गया था। स्थान-स्थान पर फूलों के गजरों से नगर की सजावट की गयी थी। शीतल चन्दन, रस तथा अन्य पवित्र सुगन्धित पदार्थों की सुवास सब ओर छा रही थी। जगह-जगह जलते हुए अंगुर की सुगन्ध फैल रही थी, सारा नगर हष्ट-पुष्ट मनुष्यों से भरा था। कितने ही व्यापारी उसकी शोभा बढ़ा रहे थे। महाबाहु पुरूषोत्तम श्रीकृष्ण ने बलरामजी तथा वृष्णि, अन्धक एवं भोजवंशी वीरों के साथ नगर में प्रवेश किया। पुरवासी मनुष्यों तथा सहस्त्रों ब्राह्मणों द्वारा सम्मानित हो उन्होंने राजभवन के भीतर प्रवेश किया। वह घर इन्द्रभवन की शोभा को भी तिरस्कृत कर रहा था। युधिष्ठिर जी बलराम जी के साथ विधिपूर्वक मिले और श्रीकृष्ण का मस्तक सूँघकर उन्हें दोनों भुजाओं में कस लिया। भगवान् श्रीकृष्ण ने प्रसन्न होकर विनीत भाव से युधिष्ठिर का सम्मान किया। नरश्रेष्ठ भीमसेन का भी उन्होंने विधिवत् पूजन किया। कुन्तीनन्दन युधिष्ठिर ने वृष्णि और अन्धकवंश के श्रेष्ठ पुरूषों का विधिपूर्वक यथायोग्य स्वागत-सत्कार किया। कुछ लोगों का उन्होंने गुरू की भाँति पूजन किया, कितनों का समवयस्क मित्रों की भाँति गले से लगाया, कुछ लोगों से प्रेमपूर्वक वार्तालाप किया और कुछ लोगों ने उन्हीं को प्रणाम किया। महायशस्वी भगवान् श्रीकृष्ण ने वधू तथा वरपक्ष के लोगों के लिये उत्तम धन अर्पित किया। घर के कुटुम्बीजनों को देने योग्य दहेज पहले नहीं दिया गया था, उसी की पूर्ति उन्होंने इस समय की।
किंकिणी और झालरों से सुशोभित सुवर्णस्वचित एक हजार रथ जिनमें से प्रत्येक में चार-चार घोडे़ जुते हुए थे और प्रत्येक में पूर्ण शिक्षित चतुर सारथि बैठा हुआ था, श्रीमान् कृष्ण ने समर्पित किये तथा मथुरामण्डल की पवित्र तेजवाली दस हजार दुधारू गौएँ दीं। चन्द्रमा के समान श्वेत कान्तिवाली विशुद्ध जाति की एक हजार सुवर्णभूषित घोडियाँ भी जनार्दन ने प्रेमपूर्वक भेंट कीं। इसी प्रकार पाँच सौ काले अयालवाली और पाँच सौ सफेद रंगवाली खच्चरियाँ समर्पित कीं, जो सभी वश में की हुई तथा वायु के समान वेगशाली थीं। स्नान, पान और उत्सव में जिनका उपयोग किया गया था, जो वयःप्राप्त थीं, जिनके वेष सुन्दर और कान्ति मनोहर थी, जिन्होंने सोने के सौ-सौ मणियों की कण्ठियाँ पहन रक्खी थीं, जिनके शरीर में रोमावलियाँ नहीं प्रकट हुई थीं, जो वस्त्राभूषणों से अलंकृत तथा सेवा के काम में पूर्ण दक्ष थीं, ऐसी एक हजार गौरवर्णा कन्याएँ भी कमलनयन भगवान् श्रीकृष्ण ने भेंट कीं। जनार्दन ने उत्तम दहेज के रूप में बाह्लीक देश के एक लाख घोड़े दिये, जो पीठ पर सवारी ढ़ोने वाले थे। दशार्हवंश के रत्न भगवान् श्रीकृष्ण ने अग्नि के समान देदीप्यमान कृत्रिम सुवर्ण (मोहर) और अकृत्रिम विशुद्ध सुवर्ण के (डले) दस भार उपहार में दिये। जिन्हें साहस का काम प्रिय है और जो हाथ में हल धारण करते हैं, उन बलराम ने प्रसन्न होकर इस नूतन सम्बन्ध का आदर करते हुए अर्जुन को पाणिग्रहण के दहेज के रूप् में एक हजार मतवाले हाथी भेंट किये, जो तीन अंगों से मद् की धारा बहाने वाले थे। वे हाथी युद्ध में कभी पीछे नहीं हटते थे और देखने में पर्वतशिखर के समान जान पड़ते थे। उनके मस्तकों पर सुन्दर वेष रचना की गयी थी। उन सब के पाश्र्वभाग में मजबूत घण्टे लटक रहे थे तथा गले में सोने के हार शोभा दे रहे थे। वे सभी हाथी बडे़ सुन्दर लगते थे और उन सबके साथ महावत थे।


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

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