भगवद्गीता -राधाकृष्णन पृ. 40

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10.ज्ञानमार्ग

उस दशा में यह अव्यक्त थी। सब मानसिक और भौतिक तत्वों की व्याख्या प्रकृति के विकास के परिणामों के रूप में की गई है। प्रकृति में तीन गुण हैं। गुण का शब्दार्थ होता है--रस्सी के धागे। ये गुण विभिन्न उनुपातों में प्रकट होकर विभिन्न प्रकार की वास्तविक सत्ताओं को उत्पन्न करते हैं। भौतिक तत्व के प्रसंग में ये तीन गुण हल्कापन (सत्त्व), गति (रजस्) और भारीपन (तमस्) के रूप में कार्य करते हैं। मानसिक तत्व के रूप में वे क्रमशः अच्छाई , आवेश और मूढ़ता के रूप में कार्य करते हैं। जब आत्म यह अनुभव कर लेता है कि वह प्रकृति के साथ सब प्रकार के सम्पर्क से रहित हो गया है, तो वह मुक्त हो जाता है। गीता इस व्याख्या को इस आधारभूत परिवर्तन के साथ स्वीकार करती है कि सांख्य में बताए गए पुरूष और प्रकृति, जिनमें कि द्वैत है, परम मूल तत्व परमात्मा के ही स्वभाव हैं।बुराई गुणों के बन्धन में फंसने के कारण उत्पन्न होती है। यह इसलिए पैदा होती है, क्योंकि प्रकृति में जिस जीवन के बीज या आत्मा को डाला जाता है, वह गुणों के बन्धन में पड़ जाता है। किसी एक या अन्य गुण की प्रबलता के अनुसार आत्मा का उत्थान या पतन होता है। जब हम आत्म को प्रकृति और उसके गुणों से पृथक् पहचान लेते हैं, तब हम मुक्त हो जाते हैं। आधिविद्यक ज्ञान[१]योग अर्थात् एकाग्रीकरण की पद्धिित द्वारा अनुभव[२] में रूपान्तरित हो जाता है। बहुत प्राचीन काल से ही ‘योग’ शब्द का प्रयोग कुछ एक विशिष्ट प्रकार के अभ्यासों और अनुभवों का वर्णन करने के लिए होता है, जिन्हें बाद में ज्ञान, भक्ति और कर्म के विभिन्न सम्प्रदायों की शिक्षाओं के अनुसार ढाल लिया गया। इनमें से प्रत्येक ध्यान योग या चिन्तन की पद्धति के अभ्यास का प्रयोग करता है। योग, पतंजलि के मतानुसार, मन की गतिविधियों का दमन है।[३] मैत्री उपनिषद् का कथन हैः “जैसे ईधन न मिलने पर आग चूल्हे में पड़ी-पड़ी बुझ जाती है, उसी प्रकार जब मन की गतिविधियों का दमन कर दिया जाता है (वृत्तिक्षयात्), तब चित्त अपने स्थान पर पड़ा-पड़ा ही बुझ जाता है।”[४] हम अत्यन्त प्रबल संकल्प के प्रयोग द्वारा ही विचारों के कोलाहल और इच्छाओं के उत्पात का दमन करने में समर्थ हो सकते हैं। योगी से कहा जाता है कि वह निरन्तर कर्म द्वारा इस संयम को प्राप्त करे।[५]


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. परोक्ष ज्ञान।
  2. अपरोक्ष ब्रह्म-साक्षात्कार।
  3. योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः।
  4. 6, 34। चित्तं स्वयोनौ उपशाम्यते।
  5. निर्विकारेण कर्मणा। हरिवंश, 11, 736

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