भगवद्गीता -राधाकृष्णन पृ. 203

अद्‌भुत भारत की खोज
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अध्याय-11
भगवान् का दिव्य रूपान्तर अर्जुन भगवान् के सार्वभौमिक (विश्व) रूप को देखना चाहता है

   
21.अमी हि त्वां सुरसंघा विशन्ति,
केचिद्धीताः प्राज्जलयो गृणन्ति।
स्वस्तीत्युक्त्वा महर्षिसिद्धसंघाः,
स्तुवन्ति त्वां स्तुतिभिः पुष्कलाभिः।।
उधर वे देवताओं के समूह तेरे अन्दर प्रवेश कर रहे हैं और उनमें से कुछ हाथ जोड़े तेरी स्तुति कर रहे हैं। महर्षियों और सिद्धों के समूह ’स्वस्ति’ (कल्याण हो) कहका अत्यन्त प्रशंसायुक्त मन्त्रों से तेरी स्तुति कर रहे हैं।आध्यात्मिक प्राणियों के समूह उस परमात्मा की स्तुति करते हैं और हर्षावेशमय उपासना में खोए रहते हैं।
 
22रुद्रादित्या सववो ये च साध्या
विश्वेअश्विनौ मरुतश्चोष्मपाश्च।
गन्धर्वयक्षासुरसिद्धसंघा
वीक्षन्ते त्वां विस्मिताश्चैव सर्वे।।
रुद्रगण, आदित्यगण, वसुगण और साध्यगण, विश्वेदेवगण और दो अश्विनीकुमार, मरुत् और पितर तथा गन्धर्वों, यक्षों, असुरों और सिद्धों के समूह, सब तेरी ओर देख रहे हैं और देखकर सब चकित हो रहे हैं।
 
23.रूपं महत्ते बहुवक्त्रनेत्रं,
महाबाहो बहुबाहुरुपादम्।
बहूदरं बहुदंष्ट्राकरालं,
दृष्ट्वा लोकाः प्रव्यथितास्तथाहम्।।
हे महाबाहु, तेरे इस अनेक मुखों और आंखों वाले, अनेक भुजाओ, जांघो और पैरों वाले, अनेक पेट वाले, अनेक बडे़-बडे़ दांतों के कारण भयानक दीख पड़ने वाले विशाल रूप को देखकर सारे लोक कांप रहे हैं ओर उसी प्रकार मैं कांप रहा हूं।यह भगवान् की सार्वभौमता तथा सर्वत्रविद्यमानता को ध्वनित करने के लिए की गई काव्योचित अत्युक्ति है।
 
24. नभःस्पृशं दीप्तमनेकवर्णं,
व्यात्ताननं दीप्तविशालनेत्रम्।
दृष्ट्वा हि त्वां प्रव्यथितान्तरात्मा,
धृति न विन्दामि शमं च विष्णो।।
तेरे इस आकाश को छूने वाले, अनेक रंगों में दमकते हुए, खूब चैड़ा मुंह खोले हुए और बड़ी-बड़ी चमकती आंखों वाले इस रूप को देखकर मेरी आन्तरिकतम आत्मा भय से कांप रही है और हे विष्णु, मुझे न धीरज बंध रहा है और न शान्ति मिल रही है।
 
25.दंष्ट्राकरालानि च ते मुखानि,
दृष्ट्वैव कालानलसन्निभानि।
दिशो न जाने न लभे च शर्म,
प्रसीद देवेश जगन्निवास।।
जब मैं बडे़-बडे़ दांतों के कारण डरावने और काल की सर्वग्रासी लपटों के समान तेरे मुखों को देखता हूं, तो मुझे दिशाएं तक सूझनी बन्द हो जाती हैं और किसी प्रकार चैन नहीं पड़ता। हे देवताओं के स्वामी, हे संसार के आश्रय, तू करुणा कर।कालानलः शब्दार्थ है प्रलय की अग्नि।अर्जुन अपने होश-हवाश खो बैठता है। इस भयंकर अनुभव में विस्मय, आतंक और हर्षाेन्माद के तत्व विद्यमान हैं।
 
26. अमी च त्वां धृतराष्ट्रस्य पुत्राः,
सर्वे सहैवावनिपालसंघैः।
भीष्मो द्रोणः सूतपुत्रस्तथासौ,
सहास्मदीयैरपि योधमुख्यैः।।
उधर सब राजाओं के समूहों के साथ वे धृतराष्ट्र के पुत्र और भीष्म, द्रोण और कर्ण, हमारे पक्ष के प्रमुख योद्धाओं के साथ-साथ ही,
 
27.वक्त्राणि ते त्वरमाणा विशन्ति,
दंष्ट्राकरालानि भयानकानि।
केचिद्विलग्ना दशनान्तरेषु,
संदृश्यन्ते चूर्णितैरुत्तमांगः।।
तेरे उन डरावने मुखों में घुसे जा रहे हैं, जो बडे़-बडे़ दांतों के कारण बहुत भयंकर हो उठे हैं। कुछ उन दांतों के बीच में फंसे दिखाई पड़ रहे हैं, उनके सिर पिसकर चूर-चूर हो गए हैं।


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

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