गैसत्राण

अद्‌भुत भारत की खोज
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  • गैसत्राण प्रथम विश्वयुद्ध (सन्‌ 1914-1919) में शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने के लिये पहले पहल युद्ध गैसों का उपयोग हुआ था और युद्ध गैस के संघातिक प्रभाव से बचने के लिये पहले पहल युद्ध में गैसत्राण का उपयोग हुआ।
  • उस समय का गैसत्राण बड़ा भद्दा होता था। यह त्राण मुख पर रखा जाता था। उसमें एक नली होती थी जो एक कनस्टर से जोड़ी रहती थी।
  • यह कनस्टर गले में सामने लटका रहता था। कनस्टर में लकड़ी का कोयला रखा रहता था, जिसमें पारित होकर शुद्ध वायु नाक में जाती थी। विषैली गैस कोयले में अवशोषित हो जाती थी।
  • इस गैसत्राण से सैनिकों को लड़ने में बहुत असुविधाएँ होती थीं। द्वितीय विश्वयुद्ध में गैसत्राण बहुत उन्नत किस्म का बना। यह पर्याप्त हल्का था और कनस्टर शरीर के पार्श्व में लटका रहता था, जिससे युद्ध करने में अड़चन कम होती थी। पीछे इसमें और भी सुधार हुआ। अब ऐसे त्राण बने जिनकी तौल तीन पौंड से भी कम थी।
  • कनस्टर अब सीधे त्राण से जुड़ा रहता। इससे भद्दी लंबी नली की आवश्यकता नहीं रही। छनी हुई शुद्ध वायु ऊपर से आती है और आँख पर लगे चश्मों को बिना धुँधला किए नाक के छिद्रों में प्रविष्ट होती है।
  • कनस्टर में भरने के लिये अब कोयले के साथ सोडा चूना भी प्रयुक्त होता है। यदि युद्धक्षेत्र की वायु में सूक्ष्म ठोस कण बिखरे हों तो उनको दूर करने के लिये त्राण के वायुमार्ग में फेल्ट के गद्दे रखे रहते हैं, जिनमें ठोस कण छन जाते हैं।
  • गैसत्राण का उपयोग अब केवल युद्ध में ही नहीं होता, वरन्‌ खान और रासायनिक संयंत्रों में, जहाँ हानिकारक गैसें और धुएँ बनते हैं, इनका उपयोग काम करनेवालों और आग बुझानेवाले व्यक्तियों के लिये भी किया जाता है।