गीता प्रबंध -अरविन्द पृ. 142

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गीता-प्रबंध
15.अवतार की संभावना और हेतु

इसलिये अवतारतत्वसंबंधी गीता का जो सिद्धांत है उसके संपूर्ण अर्थ को समझाने के लिये अवतार के इस द्विविध पहलू को जान लेना आवश्यक है। इसके बिना अवतार की भावना केवल एक मतविशेष एक प्रचलित मूढ़ विश्वास रह जायेगी अथवा यह हो जायेगा कि ऐतिहासिक या पौराणिक अतिमानवों को कल्पना के जोर से या रहस्यमय तरीके से भगवान बना दिया जायेगा और यह भावना वह नहीं रह जायेगी जो गीता की शिक्षा है, जो गंभीर दार्शनिक और धार्मिक सत्य है और जो उत्तमं रहस्यमय को प्राप्त कराने का एक आवश्यक अंग या परक्षेप है। यदि परमेश्वर - सत्ता में मनुष्य के आरोहण की सहायता करना मनुष्य - रूप में परमेश्वर के अवतीर्ण होने का प्रकृत हेतु न हो तो धर्म के लिये भगवान का अवतार लेना एक निरर्थक - सा व्यापार प्रतीत होगा; कारण धर्म, न्याय और सदाचार की रक्षा का कार्य तो भगवान की सर्वशक्तिमत्ता अपने सामान्य साधनों के द्वारा अर्थात् महापुरूषों और महान आंदोलनों के द्वारा तथा ऋषियों , राजाओं आर धर्माचार्यो के द्वारा सदा कर ही सकती है, उसके लिये अवतार की कोई प्रकृत आवश्यकता नहीं। अवतार का आगमन मानव - प्रकृति में भागवत प्रकृति को प्रकटाने के लिये होता है, ईसा, कृष्ण और बुद्ध की भगवत्ता को प्रकटाने के लिये, जिससे मान - प्रकृति अपने सिद्धांत, विचार , अनुभव, कर्म और सत्ता को ईसा, कृष्ण और बुद्ध के सांचे में ढालकर स्वयं भागवत प्रकृति में रूपांतरित हो जाये।
अवतार जो धर्म संस्थापित करते हैं उसका मुख्य हेतु भी यही होता है; ईसा , बुद्ध, कृष्ण इस धर्म के तोरणद्वार बनकर स्थित होते हैं और अपने अंदर से होकर ही वह मार्ग निर्माण करते हें जिसका अनुवत्र्तन करना मनुष्यों का धर्म होता है । यही कारण है कि प्रत्येक अवतार मनुष्यों के सामने अपना ही दृष्टांत रखते और अपने - आपको ही एकमात्र मार्ग और तोरणद्वार घोषित करते हैं; अपनी मानवता को ईश्वर की सत्ता के साथ एक बतलाते और यह भी प्रकट करते हैं कि मैं जो मानव पुत्र हूं वह और जिस उध्र्वस्थित पिता से मैं अवतरित हुआ हूं वह, दोनों एक ही हैं, - मनुष्य - शरीर में जो श्रीकृष्ण हैं वे - और परमेश्वर तथा सर्वभूतों के सृहृत जो श्रीकृणा हैं वे, ये दोनों उन्ही भगवान् पुरूषोत्तम के ही प्रकाश हैं, वहां वे अपनी ही सत्ता में प्रकट हैं, यहां मानव - आकार में प्रकट हैं। अवतार का दूसरा और वास्तविक उद्देश्य ही गीता के समग्र प्रतिपादन का मुख्य विषय है। यह बात उस श्लोक से ही, यदि उसका यथार्थ रूप से विचार किया जाये तो, प्रकट हैं। पर केवल उस एक श्लोक से ही नहीं - क्योंकि ऐसा करना गीता के श्लोकों का ठीक अर्थ लगाने का गलत रास्ता है - बल्कि अन्य श्लोकों के साथ उसका जो संबंध है उसका पूरा ध्यान रखते हुए और समग्र प्रतिपादन के साथ उसका मेल मिलाते हए विचार किया जाये तो यह बात और भी अच्छी तरह से स्पष्ट हो जाती है ।


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

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