गीता प्रबंध -अरविन्द पृ. 14

अद्‌भुत भारत की खोज
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गीता-प्रबंध
2.भगवद्गुरु

अतएव, ये सनातन अवतार, मानव-जीवन में सदा वर्तमान रहने वाला यह चैतन्य, मनुष्य में रहने वाले भगवान् ही प्रत्यक्ष प्रकट होकर गीता में मानव-आत्मा से बोल रहे हैं, जब वह जगत् में दुःखमय रहस्य के आमने-सामने खड़ी है। उसको जीवन के आशय का और भागवत कर्म के गुह्य तत्व का बोध दे रहे हैं, और दे रहे हैं भागवत ज्ञान और जगदीश्वर के आश्वासक और बलदायक शब्द तथा उसका पथ-प्रदर्शन कर रहे हैं। यही वह चीज है जिसे भारत की धार्मिक चेतना अपने समीप ले जाने का प्रयत्न करती है, फिर चाहे उसका रूप कुछ भी क्‍यों न हो, चाहे वह रूप मंदिरों में स्थापित प्रतीकात्मक मानव-आकार की मूर्ति हो अथवा अवतारों की उपासना हो या उस एक जगद्गुरु की वाणी को सुनाने वाले गुरु की भक्ति हो। इन सब के द्वारा वह उस आंतरिेक वाणी के प्रति जागृत होने की चेष्टा करती है, उस अरूप के रूप को खोजती है और उस अभिव्यक्ति भागवत शक्ति, प्रेम और ज्ञान के आमने-सामने आ जाती है। दूसरी बात यह है कि इन मानव श्रीकृष्ण का एक लाक्षणिक, प्रायः प्रतीकात्मक मर्म है, यही महाभारत के महान् कर्म के प्रवर्तक हैं, नायक-रूप से नहीं, बल्कि उसके गुप्त केन्द्र अज्ञात संचालक के रूप से। यह कर्म एक विराट् कर्म है जिसमें मनुष्यों और राष्ट्रों का सारे-का-सारा संसार सम्मिलित है, इनमें कुछ लोग ऐसे हैं जो केवल इस कर्म और इस परिणाम के सहायक होकर ही आये हैं जिससे उनका अपना कोई लाभ नहीं है, उनकी चालों को उलाटने वाले और उनका संहार करने वाले हैं; और कुछ लोग तो यहां तक समझते हैं कि इस सारे अनर्थ के मूल श्रीकृष्ण हैं, जो पुरानी व्यवस्था, सुपरिचित जगत् और पुण्य और धर्म की सुरक्षित परंपरा को मिटाये दे रहे हैं; इनमे फिर कुछ लोग ऐसे हैं जिनके द्वारा यह कर्म सिद्ध होने वाला है, श्रीकृष्ण उनके उपदेष्टा और सुहृद् हैं। जहां यह कर्म प्राकृतिक दृष्टि से हो रहा है और इस कर्म के करने वालों को उनके शत्रु से पीड़ पहुंचती है और उन्हें उन अग्नि-परीक्षाओं को पार करना पड़ता है जो उनको प्रभृत्व-लाभ करने के लिये तैयार करती हैं वहां अवतार अप्रकट हैं अथवा प्रसंग-विशेष पर आवश्यक सांत्वना और सहायता भर के लिये प्रकट होते हैं, किंतु प्रत्‍येक संकट में उनके सहायक हाथों का अनुभव होता है, फिर भी यह अनुभव इतना हल्का है कि इस विराट् कर्म के सभी कर्ता अपने-आपको ही कर्ता मानते हैं और अर्जुन भी, जो उनका अतिप्रिय सखा और उनके हाथ का मुख्य यंत्र या उपकरण है वह भी, यह अनुभव नहीं करता कि ‘मै उपरण हूं’ और उसे यह बात अंत मे स्वीकार करनी पड़ती है कि अब तक ‘मैंने अपने सखा सुहद् भगवान् का सचमुच जाना ही नहीं था।‘


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

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