गीता प्रबंध -अरविन्द पृ. 137

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गीता-प्रबंध
14.दिव्य कर्म का सिद्धांत

इसका कारण यह है कि निवृत्तिमार्ग एक उच्चतर और बलवत्तर सत्य का आश्रय लिए हैं - अवश्य ही यह सत्य भी अभी समग्र या परम सत्य नहीं है - और यदि इस धर्म को मनुष्य जीवन का विश्वव्यापी , पूर्ण और उच्चतम आदर्श कहकर फेलाया जाये तो इसका परिणाम मानवजाति के लक्ष्य की और आगे बढ़ने में में कर्मवाद की मूल की अपेक्षा कहीं अधिक बुद्धिभेद और अनिष्ट करने वाला हो सकता है। जब कोई भी बलवान् ऐकांगी सत्य पूर्ण सत्य के रूप में सामने रखा जाता है तो उसका प्रकाश बहुत तीव्र होता है , पर साथ ही उससे बहुत तीव्र संकर भी होता है ; क्योंकि उसमें जो सत्यांश है उसकी तीव्रता ही उसके प्रमोद वाले अंश को बढ़ाने वाली होती है। कर्मवादियों के आदर्श में जो भूल है उससे केवल अज्ञान में पड़े रहने की अवधि लंबी हो जाती है और मानव - उन्नति का क्रम रूक जाता है , क्योंकि यह कर्मवाद् मनुष्यों को पूर्णता या सिद्धि का अनुसंधान करने के लिये ऐसे मार्ग में प्रवृत्त करता है जहां सिद्धि या पूर्णता है ही नहीं; परंतु निवृत्तिमार्ग के आदर्श में जो भूल है उसमें तो संसार के नाश का बीज है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि यदि इस आदर्श को सामने रखकर मैं कर्म करूं तो मैं इन सब प्राणियों का खातमा कर दूंगा और संसार का कर्ता बनूंगा ।
यद्यापि किसी व्यष्टि - पुरूष की भाल से , चाहे वह देवतुल्य पुरूष ही क्यों न हो, सारी मानव जाति नष्ट नहीं हो सकती तथापि उसे कोई ऐसी विस्तृत विश्रृंखला पैदा हो सकती है जो मानव - जीवन के मूल तत्व को ही काटने वाली और उसकी उन्नति के सुनिश्चित क्रम को बिगाड़ने वाली हो सकती है। जो मानव - जीवन के मूल तत्व को ही काटने वाली और उसकी उन्नति के सुनिश्चित क्रम को बिगाड़ने वाली हो। इसलिये मनुष्य के अंदर जो निवृत्ति का झुकाव हे उसे अपनी अपूर्णता को जान लेना चाहिये और प्रवृत्ति के झुकाव के पीछे जो सत्य है, अर्थात् मनुष्य के अंदर भगवान की पूर्णता और मानव जाति के कर्मो में भगवान् की उपस्थिति , उसको भी अपनी बराबरी का स्थान देना होगा। भगवान् केवल नीवता में ही नहीं है, कर्म में भी हैं। जिस पर प्रकृति का कोई असर नहीं पड़ता ऐसे निष्कर्म पुरूष की निवृत्ति , और जो अपने - आपको इसलिये प्रकृति के हवाले कर देता है कि यह मानव विश्व - यज्ञ संपन्न हो ऐसे कर्मी पुरूष की प्रवृत्ति , ये दोनों बातें - निवृत्ति और प्रवृत्ति - कोई ऐसी चीजें नहीं हैं जिनमें से एक सच्ची हो और दूसरी झूंठी और इन दोनों का सदा से संग्राम चला आया हो, अथवा यह भी नहीं है कि ये की विरोधी हैं, एक श्रेष्ट और दूसरी कनिष्ट है और दोनों एक - दूसरे के लिये एक - दूसरे के लिये घातक हैं; बल्कि भागवत प्राकटय का यह द्विविध भाव है । अक्षर अकेला ही इनकी परिपूर्णता की कुंजी या परम रहस्य नहीं है।


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

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