गीता प्रबंध -अरविन्द पृ. 127

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गीता-प्रबंध
13.यज्ञ के अधीश्वर

यह अनंत जो सब सांत रूपों को विलग नहीं कराता , बल्कि उन्हें अपने मन में समाये हुये है, यह नैव्र्यक्तिक जो समस्त व्यष्टित्वों और व्यक्तित्वों का त्याग नहीं करता, बल्कि उन्हें अपने अन्दर लिये हुये है, यह अक्षर जो प्रकृति की सारी हलचल से अलग नहीं है, बल्कि उसका पोषण करता है, उसमें व्याप्त है और उसे धारण किये हुए है, यह वह स्वच्छ दर्पण है जिसमें भगवान् अपनी सत्ता को प्रकट करेगें। इसलिये पहले नैव्र्यक्त्कि ब्रह्म की प्राप्ति करनी होगी; विश्वदेवताओं के द्वारा , सांत के विभिन्न अंगों के द्वारा भगवान् का पूर्ण ज्ञान नहीं प्राप्त हो सकता । पर जैसी एक धारणा है कि शांत, अचल, नैव्र्यक्त्कि ब्रह्म अपने - आपमें बंद है और जिनका वह पोषण और धारण करता है तथा जिनमे व्याप्त रहता है उनसे उनका कोई वास्ता नहीं है, उनसे उनसे सर्वथा अलग है, - ऐसे नैव्र्यक्तिक ब्रह्म की नीरव अचलता भी भगवान् का सर्वप्रकाशक और पूर्ण संतोषप्रद सत्य नहीं है। उसके लिये हमें इस नैव्र्यक्तिक ब्रह्म की अचल शांति को प्राप्त होकर उन पुरूषोत्म को देखाना होगा जो अपनी भागवत महिमा के अंदर अक्षर और क्षर दोनों को धारण किये हुए है। अचलता में वे स्थित हैं, पर विश्वप्रकृति की सारी प्रवृत्ति और कर्म में वे अपने - आपको अभिव्यक्त करते हैं मुक्त होने के बाद भी प्रकृति में होने वाले कर्मो के द्वारा उनका यजन बराबर होता रहता है।
इसलिये भगवान् पुरूषोत्तम के साथ जीती - जागती और स्वतः परिपूरक एकता ही योग का वास्तविक लक्ष्य है, केवल अक्षर ब्रह्म में अपने - आपको मिटा देने वाला लय नहीं । अपने सारे जीवन को उन्हीं में ऊपर उठाना, उन्ही में निवास करना, उनके साथ एक हो जाना, उनकी चेतना के साथ अपनी चेतना को एक कर देना, अपनी खंड प्रकृति को उनकी पूर्ण प्रकृति का प्रतिबिंम्ब बना देना, अपने विचार और इन्द्रियों को संपूर्ण रूप से भागवत ज्ञान के द्वारा अनुप्राणित करना, अपने संकल्प और कर्म को सर्वथा और निर्दोष रूप से भागवत संकल्प के द्वारा प्रवृत्त करना, उन्हीं के पे्रमानंद में अपनी कामना - वासना को खो देना - यही मनुष्य की पूर्णता है, इसी को गीता ने गुह्मतम रहस्य कहा है। मनुष्य - जीवन का यही वास्तविक लक्ष्य है, यही उसके जीवन की चरितार्थता है और यह हमारे प्रगतिशील कर्म - यज्ञ की सबसे ऊंची सीढ़ी है। कारण वे ही अंत तक कर्मो के प्रभु और यज्ञ अंतरात्मा बने रहते हैं।


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

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