गीता प्रबंध -अरविन्द पृ. 10

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गीता-प्रबंध
2.भगवद्गुरु

गीता में सचमुच तीन बातें ऐसी हैं जो आध्यात्मिक दृष्टि से बड़े महत्व की हैं, प्रायः प्रतीकात्मक हैं और उनसे आध्यात्मिक जीवन और अस्तित्व के मूल में जो बहुत गहरे संबंध और समस्याएं हैं वे प्रत्यक्ष होती हैं। वे तीन बातें हैं- श्रीगुरु का भागवत व्यक्तित्व, उनका अपने शिष्य के साथ विशिष्ट प्रकार का संबंध और उनके उपदेश का प्रसंग। श्रीगुरु स्वयं भगवान हैं जो मानव-जाति में अवतरित हुए हैं; शिष्य अपने काल का श्रेष्ठ व्यक्तित्व है, जिसे हम आधुनिक भाषा में मनुष्य-जाति का प्रतिनिधि कह सकते हैं, और जो इस अवतार का अंतरंग सखा चुना हुआ यंत्र है वह एक विशाल कार्य और संग्राम में प्रमुख पात्र है जिसका रहस्मय उद्देश्य उस रंग भूमि के पात्रों को ज्ञात नहीं, ज्ञात है केवल उन मनुष्य-शरीर-धारी भगवान् को जो अपने ज्ञानमय अथाह मानस के पीछे छिपे हुए यह सारा कार्य चला रहे हैं और, प्रसंग है इस कार्य और संग्राम में उपस्थित अति विकट भीषण परिस्थिति की वह घड़ी जिसमें इसकी बाह्य गति का आतंक और धर्म संकट तथा अंध प्रचंडता इस आदर्श व्यक्ति के मानस पर प्रत्यक्ष होकर इसे सिर से पैर तक हिला देती है और वह सोचने लगता है कि आखिर इसका अभिप्राय क्या है, जगदीश्वर का इस जगत से क्या आशय है, इसका लक्ष्‍य क्‍या है, यह किधर जा रहा है और मानव-जीवन और कर्म का मतलब क्या है।
भारतवर्ष में प्राचीन काल से ही बड़े दृढ़ विश्वास के साथ यह मान्यता चली आयी है कि भगवान् वास्तव में अवतार लिया करते हैं, अरूप से रूप में अवतरित हुआ करते हैं, मनुष्य रूप में मनुष्यों के सामने प्रकट हुआ करते हैं। पश्चिमी देशों में यह विश्वास लोगों के मन पर कभी यथार्थ रूप से जमा ही नहीं ,क्योंकि लौकिक ईसाई धर्म में इस भाव का एक ऐसे धार्मिक मत-विशेष के रूप में ही प्रतिपादन किया है जिसकी युक्ति, सर्वसाधारण चेतना और जीवन व्यवहार से मानो कोई मूलगत संबंध ही न हो। परंतु भारतवर्ष में वेदांत की शिक्षा के स्वाभाविक परिणामस्वरूप यह विश्वास बराबर बढ़ता गया और जमता गया और इस देश के लोगों की चेतना में जड़ पकड़ गया है। यह सारा चराचर जगत् भगवान् की ही अभिव्यक्ति है, कारण एकमात्र भगवान् ही सत् हैं, बाकी सब उन्हीं एकमात्र सत् का सत् या असत् रूप हैं।इसलिये प्रत्येक जीवन किसी-न-किसी अंश में, किसी-न-किसी विधि से उसी एक अनंत का सांत दीखने वाले नाम रूपात्मक जगत् में अवतरण मात्र है। परंतु यह मानो परदे के पीछे अभिव्यक्ति है; और भगवान् का जो परभाव है तथा सांत रूप में जीव की यह जो पूर्णतः अथवा अंशतः अविद्या में छिपी चेतना है, इन दोनों के बीच में चेतना का चढ़ता उतरता हुआ क्रम लगा है। देह में रहने वाली चिन्मयी आत्मा, जिसे देही कहते हैं, भगवदग्नि की चिनगारी है और मनुष्य के अंदर रहने वाली यह आत्मा जैसे-जैसे अपने अज्ञान से बाहर निकलकर आत्म स्वरूप में विकसित होने लगती है वैस-वैसे वह स्वात्म ज्ञान में बढ़ने लगती है।


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

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