क्रुप

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लेख सूचना
क्रुप
पुस्तक नाम हिन्दी विश्वकोश खण्ड 3
पृष्ठ संख्या 213
भाषा हिन्दी देवनागरी
संपादक सुधाकर पांडेय
प्रकाशक नागरी प्रचारणी सभा वाराणसी
मुद्रक नागरी मुद्रण वाराणसी
संस्करण सन्‌ 1976 ईसवी
उपलब्ध भारतडिस्कवरी पुस्तकालय
कॉपीराइट सूचना नागरी प्रचारणी सभा वाराणसी
लेख सम्पादक भगवानदास वर्मा

क्रुप एक जर्मन व्यवसायी परिवार जो लोहे के सामान तथा शस्त्रास्त्र तैयार करनेवाले यूरोप के सबसे बड़े और प्रसिद्ध कारखाने का स्वामी रहा। इस परिवार की उन्नति तथा अवनति जर्मनी के राजनीतिक उत्थान तथा पतन से संबंधित रही है। लोहे तथा इस्पात के व्यापार से क्रुप परिवार का संबंध यों तो 16वीं शताब्दी से ही रहा है, किंतु 19वीं तथा 20वीं शताब्दियों में जर्मन इस्पात की उन्नति तथा विश्वव्यापक युद्धों से यह परिवार मुख्यत: संबद्ध था।

इस व्यवसाय के पूर्व संचालकों में फ्रीडरिख क्रुप (1787-1826 ई.) ने सर्वप्रथम ढला हुआ इस्पात बनाने की चेष्टा की थी। उनकी चेष्टाओं को सफलता नहीं मिली, किंतु जब उनके पुत्र ऐल्फ्रडे (1812-1887 ई.) ने सन्‌ 1848 ई. में कारबार सँभाला तब वे इस्पात की ढली तोपें बनाने में सफल हुए और उनका तोपों का व्यवसाय इतना बढ़ा कि वे ‘तोपों के राजा’ कहलाने लगे। इनके कारखाने ने 1851 ई. में हुई इंग्लैंड की विराट् प्रदर्शिनी में लगभग 55 मन (4,000 किलोग्राम) भारवाली इस्पात की निर्दोष ढली हुई सिल का प्रदर्शन कर तत्कालीन उद्योगपतियों को आश्चर्य में डाल दिया था। 1862 ई. में इस्पात तैयार करने की बेसेमर प्रक्रिया (Bessemer process) नामक रीति का यूरोप में सर्वप्रथम प्रयोग इस कारखाने ने किया। जर्मनी के युद्ध में लगे रहने से तोपें तथा इस्पात की अन्य वस्तुएँ बनाने के कारण इस कारखाने की अतुलनीय उन्नति हुई। ऐल्फ्रडे की मृत्यु के समय उनके कारखाने में 21,000 मनुष्य काम करते थे। जर्मनी की औद्योगिक उन्नति के साथ साथ क्रुप के कारखाना भी अभूतपूर्व उन्नति करता गया।

फ्रीड्रिख़ ऐल्फ्रडे (1854-1902 ई.) ने 1890 ई. से कवचपट्ट निर्माण, खानों से धातु निकालने, पोतनिर्माण तथा अन्य कामों के कारखाने स्थापित आरंभ किया। रासायनिक तथा भौतिक अनुसंधान के लिये भी उन्होंने एक संस्था स्थापित की जो क्रोम-निकेल-इस्पात संबंधी अनुसंधान के लिये विश्वप्रसिद्ध हुई। फ्रीर्डिख़ ऐल्फ्रडे की मृत्यु के समय उनके कारखाने में 43,000 कार्यकर्ता थे। जर्मनी के सम्राट् ने इनकी अंत्येष्टि क्रिया के समय उपस्थित होकर इनके प्रति सम्मान प्रदर्शित किया था।

इनके पश्चात्‌ इनकी पुत्री बर्था मालिक हुई और उन्होंने अपना सब कारबार सन्‌ 1905 में अपने पति गस्तैव फ़ान बोहलेन अंड हैेलबैख़ को सौंप दिया।

प्रथम विश्वयुद्ध के समय तक जर्मनी के अस्त्र शस्त्रों की लगभग सभी आवश्यकताएँ पूरी करनेवाला एकमात्र क्रुप का ही कारखाना था। इस युद्ध की समाप्ति से इस कारखाने को बड़ा धक्का लगा; तब उसने शस्त्रों के स्थान पर रेल के इंजन तथा कृषि के यंत्र तैयार करना आरंभ किया। नात्सी दल तथा हिटलर के अभ्युदय के साथ कारखाने का उत्पादन तथा स्थिति फिर बदली। क्रुप ने हिटलर की धन से सहायता की। द्वितीय विश्वयुद्ध के पश्चात्‌ 1945 ई. में मित्रराष्ट्रों ने कारखाने को अपने हाथ में ले लिया। क्रुप फ़ॉन बोहलेन पर युद्धापराधी होने का अभियोग लगाया जानेवाला था, किंतु न्यायालय के सम्मुख अपने पक्ष का प्रतिपादन करने में असमर्थ जानकर उन्हें छोड़ दिया गया।

उनके पुत्र ऐल्फ्रडी तथा कारखाने के 11 अधिकारियों पर 1947 ई. में न्यूरेमबर्ग में मुकदमा चला और ऐल्फ्रडी को 12 वर्ष का कारावास तथा उनकी समस्त संपत्ति के जब्त होने का दंड मिला; किंतु जनवरी, 1951 ई. में वे छोड़ दिए गए और उनकी संपत्ति जब्तों की आज्ञा भी रद्द कर दी गई। 1953 ई. में क्रुप को कोयले और इस्पात उत्पादन का कार्य कभी न करने की प्रतिज्ञा करनी पड़ी; और उन्हें इन उद्योगों के प्रतिकर के स्वरूप लगभग 33 करोड़ रुपए दिए गए। उनके अन्य उद्योग, जिनका मूल्य 70 करोड़ रुपया आँका जाता हैं, उन्हें वापस दे दिए गए।



टीका टिप्पणी और संदर्भ